कला का स्त्रोत प्रकृति..!

20160927_114045nrityaलेखनी:- कृति कुलश्रेष्ठ
NSoJ ब्यूरो

आज के दौर में हमारी आपकी कल्पना, शहरों की भीड़ और आपा-धापी से कोसों दूर एक ऐसी दुनियाँ आज भी बस्ती है जहाँ कला और प्रकृति साथ आगे बढ़ रहे हैं और एक दूसरे को सहजता से स्वीकार करते हैं । ऐसी  एक आदर्श संस्था जो आज भी गुरूकुल प्रथा का पालन कर छत्रों को कला की अलौकिकता और सांस्कृतिक धरोहर का ज्ञान दे रही है।

“मैं नृत्यांगनाओं की एक ऐसी कौम का निर्माण करने में विश्वास रखती हूँ, जिसे खुद प्रकृति ने सींचा हो..! एक ऐसी जगह बसाना चाह्ती हूँ जहाँ सिर्फ नृत्य बसता-विचरता हो, जहाँ कलाकार अपनी हर प्रकार की बुरी आदतों से दूर हो जाए और बस नृत्य और संगीत में रम जाए- मैं एक ऐसे ग्राम का निर्माण चाह्ती हूँ “-प्रतिमा गौरी, संस्थापक नृत्यग्राम, बैंगलूरू ।

ज़रा सोच कर देखिए की जहाँ नींव में इस प्रकार के खूबसूरत विचार समाए हों, वहाँ की इमारतें कितनी मज़बूत और बुनियादी तौर पर अडिग होगींं। वैसे आज के समय में इस प्रकार की विचारधारा  इतनी सहजता से नहीं मिलती और अगर आज ये कहीं पनप रही है तो कोई भी एक बार वहाँ का अनुभव ज़रूर करना चाहेगा ।
बैंगलूरू के हसरगट्टा गाँव से कुछ कि.मी. की दूरी पर जंगली रास्तों के बीच से निकलते हुए जंगल के बीच स्तिथ है नृत्यग्राम, वो गुरुकुल जहाँ अभिलाशी दूर-दूर से सांस्कृतिक नृत्यकला सीखने के लिए आती हैंऔर यहीं रहकर संपूर्ण ज्ञान प्राप्त करती हैं ।

नृत्यग्राम किसी प्रकार की भी बंदिशों को नहीं मानता, यहाँ हर उम्र के छात्र दाखिला ले सकले हैं किंतु उससे पूर्व उन्हें खुद को साबित करना होता है कि क्या वो वाकई इस कला को ग्र्हण करने के काबिल हैं के नहीं और इस्के लिए उन्हें एक माँह के लिए पर्यवेक्षणाधीन रखा जाता है और जाँच-परखने के बाद ही उन्हें दाखिल किया जाता है।

नृत्यग्राम कई प्रकार के कार्यशालाओं का आयोजन करता है जिसमें कई दीर्घकालीन ऐवंं लघुकालीन कार्यक्रम शामिल हैं। छात्र यहाँ अपनी रुचि अनुसार चुन सकते हैं किंतु जो यहाँ  रहकर सीखना चाहते हैं  उन्हें कम से कम एक वर्ष का समय तो यहाँ बिताना ही होता है।इसके अलावा यहाँ वो भी आकर कुछ समय गुज़ार सकते हैं जो एक बार यहाँ की कला का अनुभव करना चाह्ते हैं, वे भी कुछ दिन यहाँ बिता सकते हैं। यह संस्था विदेशी छत्राओं को भी दाखिला देती है और सांसकृतिक नृत्यकलओं का शिक्षण प्रदान करती हैं। यहाँ किसी भी उम्र के विध्यार्थी आ सकते हैं। रविवार को खास तौर पर छोटे बच्चों के लिए भी साप्ताहिक कार्यशालाओं का आयोजन किया जाता है और ये ही नहीं इस कला को  जन-जन तक सहजता से पहुँचाने के लिए ये कई विध्यालयों, महाविध्यालयों में नित्य-प्ररति दिन आयोजन करते ही रह्ते हैं।

यहाँ खासा तौर पर सांसकृतिक नृत्यकलओं का ज्ञान दिया जाता है जिसमें प्रमुख हैं- ओडीसी, किंतु पहले यहाँ कई और प्रकार के नृत्य भी सिखाये जाते थे जैसे:- मोहिनी अट्टम, कथ्थक, भरतनाट्यम, कुक्चीपूड़ी, मणिपूरी, कथ्थकली। यहाँ आकर जो पहली गूँज हमारे कानों में पढ़ती है, वो है शांत माहौल और बस गूँजते स्वरों पर थिरक्ते कदम जहाँ पूरा दिन बस कला को समर्पित रहता है। आज भी वो ही पारम्परिक गुरुकुल को अनुभव करना अपने आप मेंं ही रोमांचक हो जाता है और उसपर अगर आप में भी कहीं कोई कलाकार छुपा हुआ है तो ये आपको बहित कुछ दे सकता है।

“नृत्यग्राम एक ऐसी विचारधारा को आगे लेकर चल रहा है जो उसकी संस्थापक गौरीमाँ ने स्थापित की थी कि नृत्य जीवन जीने की कला है जो उसको धारण करने वाले के भरोसे और विश्वास पर आश्रित होता  है, एक अच्छा कलाकार होना एक अच्छे इंसान होने के बाद आता है।”- ममता, संचालक नृत्यग्राम्।

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