संदेहित तलाक़नामा !

talaqलेखनी:- कृति कुलश्रेष्ठ
NSoJ ब्यूरो

बार-बार उठते सवालों को जवाब की दरकार है, पर मस्ला ये है कि कैसे..? काफी लम्बे अरसे से ये सवाल अदालत के सामने खड़ा हुआ है कि अखिर तीन तलाक की प्रथा को खत्म किया जाए या नहीं । जो इसके साथ में हैं और जो विरुद्ध सबके पास अपने-अपने तर्क हैं

मौजूदा स्तिथी:                                                                                            8/12/16 को अलाहबाद हाई कोर्ट ने अपने एक  टिप्पणीं में ये बात साफ साफ कहा कि तीन तलाक़ महिलाओं के मौलिक अदिकारों का हनन है और ये वैद्ध नही माना जा सकता   फीलहाल ऑल इंडिया मुस्‍लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB)  ने कहा है कि वो इसे के हिलाफ याचिका दायर करेगा कुंकी ये उनकी स्ववधर्मम पालन के अदिकार के खिलाफ है।  यहाँ सवाल अब मौलिक अधिकार और धर्मनिर्पेक्षता के बीच की लड़ाई का है । और दूसरा बड़ा सवाल ये है कि क्या वाकई मुस्लिम महिलाएँ ये स्वीकार करेंगीं, कहना मुश्किल है ।

विचारों की आपा-धापी के बीच इसी वर्ष फरवरी  में शायरा बानों जो काशीपुर, उत्तराखन्ड की रहने वाली हैं,ने  उच्च अदालत में अर्ज़ी दाखिल करते हुए अपील की थी कि देश के “शरियत कानून” के तहत, जो तीन तलाक की प्रथा का उल्लेख है उस पर  पुनः विचार किया जाए । ऐसा उन्होंने उनके पती द्वरा तलाक़-ए-बिदत (तीन तलाक ) का उपयोग कर उन्हें तलाक़ देदेने के बाद किया था । जिसके  खिलाफ जाते हुए उन्होंने अदालत से ये अपील की थी ।

प्रष्ट्भूमि:                                                                                           मुस्लिम पर्स्नल लॅ 1937 या शरियत में देश के मस्लिम समुदाय को ‘शरियत’ जो ‘कुरान’ और ‘हदीथ’ से प्रेरित है, का पालन करने की आज़ादी देता है। जिसके तहत तलाक़-ए-बिदत, निकाह , निकाह हलाल अदि जैसी कई प्रथाएँ शामिल हैं ।

इससे पूर्व भी शाह बानो ने आज से लगभग 40 साल पहले निकाह हलाल की प्रथा की वैद्धता पर सवाल खड़ा किया था और अब फिर ये सवाल अदालत के सामने लाया गया है जो अपने आप में ही बहस को बड़ावा देता है । और हुआ भी वोही इस मामले के सामने आने के बाद से ही इतने लम्बे अरसे से इस मुद्दे पर कुछ यूँ बहस छिड़ी है कि आज भी कोई नतीजा नहीं निकल पाया है और एक प्रचन्ड रूप लिया और काफी बहस हुई नतीजतन अब फिर वो ही बेपर्वाहि सदृश्य है । बहरहाल, शायरा बनो द्वरा जो याचिका दायर की गई थी उसके मुताबिक  तलाक़-ए-बिदत की जिस प्रथा का विवरण शरियत में किया गया है ऐस कुछ क़ुरान या हदीथ में कोई उल्लेख नहीं है और कई जनकारों का मनना है कि तीन-तलक़ तभी मान्य होगा यदि तीन बार तलक़ बोलने के लिए 90 दिनों क समय लिया गया हो ।

दलीलें:

शायरा  बानो के अलाव और भी कई ऐसे मुस्लिम महिला संगठ न हैं जो इस याचिका को ज़रूरी बतते हुए उच्च अदालत के पास गये थे । जैसे मुस्लिम महिला अंदोलन, बेबाक़ गुट, और इजीनियर इर्फान अली ने शायरा बनों की याचिका को सही ठहराते हुए अंतरित याचिका भी दायर की थी ।

लेकिन, तीन तलाक़ की पैरवी करने वालों का कहना है कि ये प्रथा समुदाय की महिलाओं को बेवजह कि सरकारी झमेलों से बचाती है और दूसरी दलील ये कि ये महिला हत्या दर को भी कम करने में सहायक है ।  इन पैरोकारों में जो सबसे आगे हैं वो हैंऑल इंडिया मुस्‍लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) जिसने ‘मुस्लिम पर्सनल लॉ’ में बदलाव चाहने वालों की घोर निंदा की ।

ऑल इंडिया मुस्‍लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने शीर्ष अदालत में शायरा बानों की याचिका के खिलाफ जाते हुए ये कहा कि भारतीय सम्विधान में धार्मिक प्रथाओं का पलन करने की पूर्ण स्वतंत्रता दी गई है और उनका धर्म महिलाओं के हित में ही सोचते हुए तीन तलाक़ या बहुविवाह को वैध्दता प्रदान करता है । और दलील ये दी गई कि गैर कानूनन तरीके से कि गए बहू विवाह से बहतर है कि बहूविवाह को वैध्द माना जाए इससे महिलाओं के शोषण को घटाया जा सकता है, जिसमें  कि सबसे ज़्यादा खतरा दूसरी पत्नी को होता है । और कई मामलों में पत्नी की हत्या कर दी जाती है इस्लिए ये सहज तरीका ज़रूरी है ।

यहाँ ये जानना भी ज़रूरी है कि अलाहाबाद हाईकोर्ट की एक काफी  प्रभावी छवी रही है।  इतहास गवाह है की कई बड़े फैसले  जैसे  इंदिरा गांधी   को सज़ा और भी कई प्रभावी फैसले यहाँ लिए गए हैं। और इस लिए भी उसकी ये टिप्पणीं महत्वपूर्ण हो जाती है।

यह तो साफ है कि इस तरह की प्रथा और उसकी पैरवी करने वालों की महिलाओं कि प्रती मानसिकता को साफ करते है क्योंकि यातो वो उन्हें आगे नहीं बढ़्ने देना चाहते या उन्हें मात्र खेलने की वस्तु समझते हैं और ये किसी भी समाज कि लिए किस प्रकार अच्छा हो सकता है ये वो तथाकथित रखवालों को ही बहतर पता होगा ।

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