बैंगलूरू की झील है पक्षी प्रेमीयों के लिए प्रेरणा

putt1कृति कुलश्रष्ठ                                                                                               NSoJ ब्यूरो

अपनी कई प्रकार की खासियतों के साथ-साथ भारत की एक और बड़ी दिलचस्प खूबी है और वो है यहाँ का मौसम जो न सिर्फ यहाँ रहने वाले मनुष्यों को बल्कि यहाँ के पंछीयों को भी अति प्रिय है। ये ही नहीं बल्कि दुनियाँ के कई अन्य हिस्सों में रहने वाले पंछीयों को भी यहाँ का मौसम खूब भाता है। उस पसंद का ही नतीजा है कि हर साल मौसम बदलते ही दुनियाँ भर से कई तरह के परंदे हज़ारों मीलों के सफर को तय करके यहाँ आते हैं और भारत के कई शहरों को अपना आश्रय बनाते हैं।

उन खुशनसीब शहरों में से एक हमारा अपना शहर बैंगलूरू भी है जहाँ इस वक़्त लगभग 150 चिड़ियों की प्रजातियाँ देखीं गई हैं, जो सुनने में तो अपको हो सकता है कि काफी अच्छा लगे मगर अगर कई विश्वसनीय सस्थानों (indianbirds@fb.com),(ebird.org) के अनुसंधानों में मिले आँकड़ों की मानी जाए तो ये कोई खास खुशी की बात नहीं है। उक्त वेबसाइट के मुताबिक बंगलूरू पिछले 10 सालों में अपनी 1/3% प्रवासी चिड़िया खो चुका है।

ऐसा नहीं है कि इस परिस्तिथी से निकलने के लिए कोई भी कदम नहीं उठाए जा रहे हैं, आज इस विचारणीय परिस्तिथी से नपटने के लिए एहतियात के तौर पर कई कदम उठाए जा रहे हैं और कई के परिणाम तो प्रत्यक्ष भी हैं।

“बंगलूरू की अपनी अलग ही एक हरे-भरे शहर की छवी रही है मगर, पिछले 10 सालों से जबसे शहरिकरण के कारण ये सूरत बदल रही है नतीजतन ये परिणाम प्रत्यक्ष हैं। झीलें सूखने और पेड़ों के कटने से हो रहे जलवायू परिवर्तन के चलते हमारे खास महमान हमसे रूठते जा रहे हैं। इसी परिवर्तन के चलते हमरे ही शहर के कुछ लोगों ने इस प्राक्रतिक सौंदर्य को संघरक्षण प्रदान करने के बरे में सोचते हुए पुत्तेनहल्ली कि 34 एकढ़ एलाके में फैली हुई झील को पुनः सुंदर बनाने के लिए कर्यरत हैं- ऊषा राजगोपालन (अध्यक्षा, पुत्तेनाहलि झील कल्याण समीति)।”

इस वर्ष  पुत्तेनहल्ली कि झील की हालत सुधारने के लिए वहाँ की ज़िम्मेदार संस्था पुत्तेनहल्ली नेबरहुड लके इम्परूवमेंट ट्रस्ट (PNLIT) ने एक नया तरीका खोजा है कि जिस्से यहाँ की खूबसूरती को फिर से बहाल किया जा सके और पुनः पंछीयों को यहाँ अकर्षित किया जा सके। यहाँ के ही लोग जो पछ्ले कई दशकों से प्रतिवर्ष यहाँ पर आने वाले कई तरह के प्रवासीयों को पनप्ते देखते आ रहे हैं,

उन्हीं में से एक हैं मधुरिमा जो कि एक पक्षी द्रष्टा हैं, जिनका कहना है कि पक्षीयों के ना आने की दो वजह हो सकती हैं – पहली: यातो हमारे शहर के वातावरण में बदलाव हो रहा है जिसके कारण इन महमानों के यहाँ आने और प्रजनन के लिए हलात उपयुक्त नहीं लग रह गए हैं या दूसरा कारण ये कि जहाँ से ये पक्षी आते हैं उन यूरोपी देशों के पर्यावरण के साथ कुछ गडबडी है। दोनों ही स्तिथियों में ये स्तथी चिंताजनक है।

“आज से 10 साल पहले लगभग 90 प्रकार की चिड़ियाँ आती थी मगर आज ये घट कर 10 ही रह गईं हैं। यह एक विचार्णींय स्तथी है इसलिए हमने कुछ कदम उठाए हैं जैसे मानव निर्मित कृत्रिम द्वीपों का निर्माण किया है जोकि पी.वी.सी पाइपों से बने हैं और इनके ऊपर ऐसे हम यहाँ झील के पानि को भी पूरि तरह साफ करने की कोशिश कर रहे हैं और हमने यहाँ चिडियों के लिए खाने और पनपने का पूरा इंतेज़ाम भी किया है मगर ये एक ऐसी प्रकर्तिक घटनाऐं हैं जो की पूरी तहर हमारे काबू के बाहर है- मधुरिमा”

“जलवायू परिवर्तन और बढ़ते प्रदूशण के कारण ऐसा हो रहा है ये सिर्फ किसी संस्था या सरकार का ही काम नहीं है बल्कि ये एक सामुहिक कार्य है और हम आप सभी को एक साथ मिलकर इसे सुलझाना होगा- ऊषा राजगोपालन ।”

“इसके विपरीत एक और हैरान करने वाली बात ये है कि कुछ पक्षी ऐसे भी हैं जो पिछले साल यहाँ आए तो थे मगर, वापस  नहीं लौटे शायद उन्हें यहाँ का वातवरण कुछ ज़्यादा ही लुभा गया है ये एक अच्छा संकेत है- मदुरिमा”

ये झील बाकी झीलों के लिए एक अच्छी प्रेरणा बन सकती है।

 

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